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गाँव का शहरी रिश्ता village life




                               शहरी दृश्य Vs गाँव दृश्य


  खुद कि लाश अपने कंधों पर उठाए हैं
 ऐ शहर के बाशिंदों हम गांव से आए हैं।
                                       
 अदम गोंडवी

टीवी पर ऐड आया वाशिंग पाउडर निरमा सबकी पसंद निरमा गांव की औरतें मन ही मन सोच लिया करती थी, कि अगली बार कपड़े निरमा से ही धोने हैं।
मुझे अपना बचपन अच्छे से याद है, वो बचपन कपड़ों के लिहाज  से मिट्टी से जुड़ा होता था मतलब मिट्टी और कपड़े की गहरी दोस्ती होती थी।

  1991 के बाद शहरी व्यवस्था का वह दौर भी आया जब लोग सपने लेकर शहरों की चका-चौंध में चमकने के लिए शहरों में जाने लगे।  वँहा तो सीमेंट उद्योग व कॉंक्रीट के ढांचा में प्रत्यक्ष या यूं कहें एक जीजा और साले का रिश्ता हो गया था।

मिट्टी के ढांचे, वन और भाईचारे की सोच शहरी संस्कृति के बीच हांफती नजर आई, या दूसरे शब्दो में हारी हुई अपनी जंग को लड़ रही थी। इसी शहरी जीवन की आदतों में एक बेशुमार आदत और शामिल हो गई एकाकी जीवन अर्थात
अर्थात लोगों के जीवन से संयुक्त परिवार की डोर टूटने लगी।
       
  सुना है, उसने खरीद लिया है करोड़ों का घर शहर में
       मगर आंगन दिखाने आज भी वो बच्चों को गांव लाता है।

 जैसे जीत हुआ राजा पराजित राज्य को लुटता है वैसे ही गांवो में शहरी लूट हुई।

 इसी बीच गांव की आबोहवा भी तेजी से बदल रही थी। एक समय जहां हर घर में आंगन पेड़ व मिट्टी से लिपे-पीते के घर होते थे।गौमाता का गोबर घरों के आंगन का आभूषण होता था। वर्षा का जल भी हमारे हिस्से के जल के रूप में भोम जल बन जाता था ।  लेकिन लेकिन सपनों और सुविधाओं की आड़ में गांव शहरी आदर्शों और शहरी  आदर्शों का बोझ नहीं उठा सके।इसीलिए गांव भी अब शहरी संस्कृति का पायलट प्रोजेक्ट बन चुका था।मतलब सड़कों से लेकर आंगन कच्चे घरों से लेकर मकान सब कॉंक्रीट के उपासक हो गए थे।

जब लोगों को पूंजीवादी या यूं कहें कि शहरी जीवन से ऊब गए तो उन्होंने गांव की ओर देखना शुरू किया लेकिन जब तक गांव से शहरी जीवाश्म के रूप में बदल चुके थे।

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